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सुपौल : आर्थिक आधार पर दिए जाने वाले 10% आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान के खिलाफ फैसला पर पुनर्विचार करे कोर्ट- इंजीनियर निराला

मिथिला सिटी न्यूज़ 
छातापुर।सुपौल।सोनू कुमार भगत।

राष्ट्रीय युवा महासंघ के अध्यक्ष इंजीनियर एलके निराला ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10% आरक्षण पर फैसलाल को अवैध तथा असंवैधानिक बता कर रोष व्यक्त किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए महासंघ अध्यक्ष इंजीनियर एलकेयर निराला ने कहा सुप्रीम कोर्ट को एक बार पुनः इस पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का हिस्सा नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व के लिए है जो शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोग हैं उनके उत्थान के लिए हैं गरीबी से उत्थान के लिए सरकार के पास योजना बनाने के लिए अलग-अलग विभाग है
आर्थिक आधार पर 10 %आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण, संविधान की मूल भावना के विपरीत 5 जजों की बेंच मैं सभी जज एक ही खास जाति के होने के कारण इस फैसला पर विश्वास जाहिर नहीं किया जा सकता जजों की बेंच में एक भी एससी एसटी ओबीसी समाज का जज नहीं रहने के कारण आज इस फैसला को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दिखा दिया। लेकिन यह असंवैधानिक और अवैध है और संविधान के मूल भावना का अपमान भी है।”ये सही है कि कुछ सवर्ण ग़रीब यानी #EWS हैं। लेकिन बाक़ी ग़रीबों की तरह वे मनरेगा में काम क्यों नहीं करते?
आरक्षण कोई ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम तो है नहीं। आरक्षण तो प्रतिनिधित्व के लिए है। और उनका प्रतिनिधित्व तो आबादी से कई गुना ज़्यादा है।
इंजीनियर निराला ने कहा 1992 में जब मंडल कमीशन के द्वारा पिछड़ों को आरक्षण दिया जा रहा था आबादी के आधार पर तो कोर्ट ने उस पर रोक लगा दिया था और 50% के दायरा दिखाकर 52% वाले ओबीसी को केवल 27% आरक्षण दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट को या फैसला करना होगा कि क्या
ओबीसी आरक्षण 52% करेगा। यदि नहीं तो फिर ईडब्ल्यूएस को आरक्षण की सीमा तोड़कर आरक्षण देने की आधी रात को क्या आवश्यकता पड़ी बहुजन समाज को कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायिका से विश्वासु करता जा रहा है क्योंकि इनका प्रतिनिधित्व संविधान के इस तीनों संस्थानों में नाम मात्र हैं और कोर्ट में कॉलेजियम सिस्टम रहने के कारण एक ही जाति वर्ग का दबदबा होने के कारण इस तरह के फैसले पर कोर्ट के जज सहमति जाहिर करते हैं जो चिंता का विषय है अब हम लोगों को सड़क पर उतरकर आबादी का धार पर भागीदारी के लिए आवाज बुलंद करना होगा और यही जज #EWS केस में कहा- “50% की लिमिट से ऊपर दे सकते हैं आरक्षण।”
बालाजी केस और इंदिरा साहनी केस के फ़ैसलों के कारण अब तक नहीं बढ़ पा रहा था ओबीसी कोटा। ओबीसी को अब आगे बढ़कर माँग लेना चाहिए कोई नहीं रोकेगा।

अधिकार मांगने से नहीं बल्कि उनके लिए संघर्ष करने की आवश्यकता प्रेस के माध्यम से निराला ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को दिए जा रहे 10 प्रतिशत आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैध ठहराया जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण फैसला है, जो संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है. संविधान में आरक्षण की व्यवस्था आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक, शैक्षिक व ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर की गई है. जिस वक्त यह 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा रहा था, हमने उसका विरोध किया था और आज एक बार फिर अपना विरोध दर्ज करते हैं.

दूसरी ओर, न्यायालय द्वारा वंचितों के आरक्षणों को लेकर तरह-तरह की शर्तें और जमीनी डाटा कलेक्शन के नाम पर उसमें जारी कटौती को न्यायोचित ठहराया जा रहा है. वहीं, सामाजिक तौर पर ऊंचे पायदान पर खड़े लोगों के लिए विशेष आरक्षण के प्रावधान को बिना जमीनी हकीकत जाने न्यायसंगत ठहराना कत्तई उचित नहीं है. आठ लाख सालाना आमदनी को आधार बनाकर 10 प्रतिशत विशेष आरक्षण का प्रावधान आर्थिक तौर पर कमजोर सामाजिक समूह की भी हकमारी है।
उन्होंने कहा कि और भी बड़े संवैधानिक बेंच का गठन करके इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
सवर्ण EWS आरक्षण पर फ़ैसला सुनाने के लिए 5 सवर्ण जजों की बैंच बनाना बहुत बड़ा घोटाला है। #casteist_collegium इसका भी पूरे देश में भंडाफोड़ होना चाहिए और सीधे तौर पर या तो आबादी का धार पर भागीदारी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें न्यायपालिका अन्यथा समान शिक्षा व्यवस्था देश में लागू करें और अविलंब ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर पुनर्विचार करें इस फैसले पर हम लोग खामोश बैठने वाले नहीं है पूरे देश में देशव्यापी आंदोलन दूसरा मंडल आंदोलन की आवश्यकता पड़ेगी तो हम लोग तैयार हैं सबसे बड़ी बात यह है कि यदि आर्थिक आधार पर गरीब लोगों का आरक्षण है तो इसमें पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति जनजाति को शामिल क्यों नहीं किया गया जिस बात को लेकर मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित और रविंद्र भट्ट ने भी असहमति जाहिर किया।

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