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निकाशी के चन्द्रशेखर झा भी रहे आजादी के योद्धा

दरभंगा

12 अगस्त 2022

रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर संवाददाता

 

दरभंगा जिला हमेशा से अपने गौरवपूर्ण गाथा को लेकर प्रसिद्ध है चाहे यहां के राजाओं की बात हो या आजादी के वीरो‌ की सभी में दरभंगा अग्रणी रहा है यहां की मिट्टी ने सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानी को जन्म दिया है जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था बता दें कि मिथिला सीटी न्यूज़ लगाकर पिछले 12 दिनों से दरभंगा जिले के अनेक प्रखंडों के गांवों से आजादी के सपुतो के बिषय में कहानी लिख रहा है,आज की कहानी है सिंहवाड़ा प्रखंड के निकाशी गांव के चन्द्रशेखर झा की बता दें कि दरभंगा जिले के सिंहवाड़ा प्रखंड की धरती अपनी इतिहास लिए विख्यात रही है, यहां के सपूतों ने अंग्रेजी सरकार के छक्के छुड़ायें इस क्षेत्र के सपूतों ने स्वतंत्रता संग्राम मे जो बलिदान दिया वह आज भी इस धरती की पहचान है,75 वीं स्वतंत्रता दिवस की तैयारी में जुटे क्षेत्र के निकाशी गांव के लोग आज भी अपने गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर झा की आजादी में योगदान के किस्से सुनाते गर्व महसूस करतें हैं, गांव के लोग एवं दस्तावेजों के अनुसार 1925 में चन्द्रशेखर झा का जन्म निकाशी गांव के विद्वान परिवार में हुआ था, इनके पिता मध्यप्रदेश में संस्कृत महाविद्यालय में प्रधानाध्यापक थे, इन्होंने सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ डटकर मुकाबला किया था, उस समय मुहम्मदपुर स्टेशन पर ये और इनके साथियों ने अंग्रेजी सरकार के रेल को रोका तथा सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी अंग्रेजी सरकार ने लगाया था, ये लगभग 6 महिनों तक भुमिगत रहें तथा अंग्रेजी सरकार से लोहा लेते रहे,बताया जाता है की जब सिंहेश्वर प्रसाद के अगुवाई में पंण्डित जवाहरलाल नेहरू समेत कई स्वतंत्रता सेनानी दरभंगा पहुंचे थे तब सिरहुल्ली से सिंहेश्वर प्रसाद, लक्ष्मण प्रसाद तथा निकाशी से चन्द्रशेखर झा भी मौजूद थे, आजादी में हिस्सा तथा अन्य प्रकार के कई दस्तावेज अभी भी इनके परिवार वालों के पास मौजूद हैं ग्रामीण बताते हैं कि जिवन भर गांधी के आदशों को मानते हुए इनका निधन 2012 में 90 की उम्र में हो गया, निकाशी के ग्रामीणों ने बताया कि ये उनके लिए गौरव की बात है, और उन्हें इस बात का गर्व है की उनके गांव के सपुत ने भी आजादी के लड़ाई में भाग लिया। हमारे संवाददाता ने जब इस बात को पता किया तो जानकारी मिली के पुरे हरिहरपुर पुर्वी पंचायत में ये एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं परन्तु आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी पुरे पंचायत में इनके नाम का एक स्मारक या प्रवेश द्वार तक नहीं है और ना ही जनप्रतिनिधि को पता ही है की उनके पंचायत में कोई स्वतंत्रता सेनानी भी थे,जब तक वो जिवीत थे सरकार की ओर से प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सम्मानित किया जाता था परन्तु उनके सम्मान में एक प्रवेश द्वार या स्मारक नहीं बनाया जा सका।

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