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नहाय – खाए के साथ आरंभ हुआ चार दिवसीय आस्था एवं विश्वास का माहा पर्व छठ पूजा

मधुबनी  : छठ पूजा का प्रारंभ दो दिन पूर्व चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है, फिर पंचमी को लोहंडा और खरना होता है. उसके बाद षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है, जिसमें सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है. इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और फिर पारण करके व्रत को पूरा किया जाता है. तिथि के अनुसार, छठ पूजा 4 दिनों की होती है. आइए जानते हैं कि इस वर्ष छठ पूजा की तिथियां क्या हैं. नदियों और तालाबों के किनारे छठ पूजा पर लगी रोक, सरकार ने जारी किए दिशा निर्देश जारी किया गया है।

पहला दिन- नहाय-खाय
छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है. यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, इस दिन नहाय खाय होता है. इस वर्ष नहाय-खाय 18 नवंबर (बुधवार) को है. इस दिन सूर्योदय सुबह 06:40बजे और सूर्योस्त शाम को 05:20बजे पर होगा.

दूसरा दिन- लोहंडा और खरना
खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है. यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है. खरना 19 नवंबर दिन गुरुवार को है. इस दिन सूर्योदय सुबह 06:41 बजे पर होगा और सूर्योस्त शाम को 05:19 बजे पर होगा. खरणा संध्या 05:19 के उपरांत

तीसरा दिन- छठ पूजा (सन्ध्या अर्घ्य)

छठ पूजा का मुख्य दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है. इस दिन ही छठ पूजा होती है. इस दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है इस वर्ष छठ पूजा 20 नवंबर को है. इस दिन सूर्यादय 06:41बजे पर होगा और सूर्योस्त 05:19 बजे पर होगा. छठ पूजा के लिए षष्ठी व्रत संध्या कालीन आर्घ दान संध्या 05:05 से प्रारंभ।

चौथा दिन- सूर्योदय अर्घ्य (पारण का दिन)

छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है. इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है. उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है. इस वर्ष छठ पूजा का सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण 21 नवंबर को होगा. इस दिन सूर्योदय सुबह 06:42 बजे तथा सूर्योस्त शाम को 05:18बजे होगा।
अर्घ दान का समय प्रातः 06:42 बजे से होगा।

छठ पर्व से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है. छठ के 4 दिनों के दौरान सूर्य उपासना आपको धन-धान्य और सेहत से मालामाल कर सकती है. इस चमत्कारी व्रत से जीवन के हर हिस्से में बेहतरी आती है. लेकिन छठ का नाता केवल धर्म से नहीं. इसके तमाम वैज्ञानिक पहलू भी हैं. इसीलिए इस महान पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है. कैसे? आइए जानते हैं…
कार्तिक मास में भगवान सूर्य की पूजा की परंपरा है, शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को इस पूजा का विशेष विधान है. छठ पूजा के तमाम वैज्ञानिक महत्व हैं.
सहर के जाने माने ज्योतिष के जानकार पंकज झा शास्त्री बताते है कि पूजा का विधि-विधान व्रती के शरीर और मन को सौर ऊर्जा के अवशोषण के लिए तैयार करता है. बहुत कम ही लोगों को पता है कि छठ पूजा की इसी प्रक्रिया के जरिए प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि बिना भोजन-पानी ग्रहण किए बिना कठोर तपस्या करने की ऊर्जा प्राप्त करते थे. छठ पूजा की विधि द्वारा ही वे भोजन-पानी से अप्रत्यक्ष तौर पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा के बजाए सूर्य के संपर्क से सीधे ऊर्जा प्राप्त कर लेते थे.
षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर होता है. इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं. उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में रहा है.
पंकज झा शास्त्री के अनुसार और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है.
इस पूजन का वैज्ञानिक पक्ष ये है कि इससे सेहत से जुड़ी समस्याएं परेशान नहीं करतीं.
वैज्ञानिक रूप से देखें तो इस माह में सूर्य उपासना से हम अपनी ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्तर बेहतर बनाए रख सकते हैं.
दीपावली के बाद सूर्यदेव का ताप पृथ्वी पर कम पहुंचता है. इसलिए व्रत के साथ सूर्य के ताप के माध्यम से ऊर्जा का संचय किया जाता है, ताकि शरीर सर्दी में स्वस्थ रहे.इसके अलावा सर्दी आने से शरीर में कई परिवर्तन भी होते हैं. खास तौर से पाचन तंत्र से संबंधित परिर्वतन. छठ पर्व का उपवास पाचन तंत्र के लिए लाभदायक होता है. इससे शरीर की आरोग्य क्षमता में वृद्धि होती है.
छठ में दिए जाने वाले अर्घ्य का भी विशेष महत्व है. सुबह, दोपहर और शाम तीन समय सूर्य देव विशेष रूप से प्रभावी होते हैं, सुबह के वक्त सूर्य की आराधना से सेहत बेहतर होती है.

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