दरभंगा : शिक्षकों ने कालीपट्टी बांध जताया विरोध – मिथिला सिटी न्यूज़ 

दरभंगा 05 सितम्बर 2020

दरभंगा : लंबे समय से अपने मांगो की पूर्ति के आस लगाए शिक्षकों का आक्रोश दिन प्रतिदिन तेज होता जा रहा है। शिक्षकों को यह उम्मीद थी कि चुनावी वर्ष में सरकार उनकी मुख्य मांग नियमित शिक्षकों की भांति वेतनमान और सेवाशर्त तो अवश्य पूर्ण करेगी लेकिन कोरोना संकट के उपरांत शिक्षक भी यह मान गए थे कि सरकार उनकी वितीय मांगे पूरा करे न करे लेकिन उन्हें राज्यकर्मी का दर्जा, पेंशन, ग्रेच्युटी, पुरुष शिक्षकों को ऐच्छिक स्थानांतरण, महिला शिक्षिकाओं को शिशु देखभाल अवकाश तथा अर्जितावकाश इत्यादि तो निश्चित ही मिलेगा लेकिन सरकार ने जब सेवाशर्त का प्रकाशन किया तो ये सारी मांगे सेवाशर्त से गायब दिखी जो मिला भी वह भी काफी कम या कांट छांट करके। इससे शिक्षक फिर से आंदोलनरत हो गए और पहले फेसबुक, ट्विटर के माध्यम से अपना विरोध प्रदर्शित किए तब मजबूर होकर शिक्षक दिवस के दिन उन्होंने कालीपट्टी बांधकर विद्यालय एवं प्रखण्ड मुख्यालय पर अपना विरोध दर्ज किया तथा सरकार से यह मांग किया कि अभी भी वक्त है उनकी मांगों पर पुनर्विचार हो तथा सेवाशर्त में सुधार करते हुए नियमित वाला सेवाशर्त लागू किया जाए।

टीईटी एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ गोपगुट के राज्यव्यापी आह्वान पर जिला के हजारों शिक्षक जिलाध्यक्ष प्रमोद मण्डल, कार्यकारी जिला महासचिव रंजीत यादव, जिला प्रवक्ता धनन्जय झा, कोषाध्यक्ष शिबली अंसारी, उपाध्यक्ष डा रणधीर राय, राशिद अनवर इत्यादि के संयुक्त अध्यक्षता में विभिन्न प्रखण्ड मुख्यालयों पर अपना विरोध दर्ज करते हुए अधिकार प्राप्ति तक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।मौके पर जिलाध्यक्ष प्रमोद मण्डल, महासचिव रंजीत यादव ने कहा कि सरकार ने शिक्षकों के मुख्य मांग तो दूर उन्हें राज्यकर्मी को देय सुविधा से भी वंचित रखा है आज एक शिक्षक को एक आदेशपाल के भांति भी सभी अवकाश एवं सुविधाएं देय नही है। वैसे तो शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षकों का सम्मान किया जाता है लेकिन यहां शिक्षक को स्वयं अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। अभी भी वक्त है सरकार शिक्षकों की मांगों को पूरा करे।

वही संघ के जिला कोषाध्यक्ष शिबली अंसारी, प्रवक्ता धनन्जय झा ने कहा कि ईपीएफ का लाभ भी मूल वेतन और डीए पर न देकर पंद्रह हजार पर दे रही है वही अर्जितावकाश में तीन सौ दिन के बदले एक सौ बीस दिन का देकर वहां भी कांट छांट की है। मंसूबा साफ है कि सरकार शिक्षकों के प्रति कभी संवेदनशील नही रही है और न ही विभाग को शिक्षकों से कोई सहानुभूति है।

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